Tuesday, May 12, 2020

विजयनगर

विजय नगर 

मध्य कालीन इतिहास

विजय नगर साम्राज्य(1336 ई.-) 
दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य(विजयनगर/जीत का शहर)
स्थापना -1336 ई.में 
स्थापना कर्ता- हरिहर एवम् बुक्का  
राजधानी- क्रमशः-अनेगोंडी, विजयनगर, पेनेकोंडा तथा चंद्रगिरी।हम्पी, ( हस्तिनावती) विजय नगर की पुरानी राजधानी राजधानी का प्रतिनिधित्व करता है।वर्तमान में इसका नाम हम्पी( हस्तीनावती) है।
विजय नगर का राष्ट्रीय सिक्का - वराह(स्वर्ण सिक्का)
धर्म- शैव,कृष्णदेव राय का धर्म वैष्णव ।
राज भाषा- तेलुगू  

विजय नगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर एवम् बुक्का नामक दो भाइयों ने अपने गुरु विद्यारयन संत के आशीर्वाद से की थी।
हरिहर प्रथम (1336-1356 ई.)
हरिहर प्रथम संगम वंश का प्रथम शासक था।इसकी पहली राजधानी अनेगोंडी थी।बाद में इसने अपनी दूसरी राजधानी विजय नगर को बनाया ।वर्तमान में इसके अवशेष हम्पी में स्थित है। गद्दी पर बैठने के बाद हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्का की सहायता से साम्राज्य विस्तार का कार्य आरंभ किया तथा विजय नगर साम्राज्य को उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर दक्षिण में कावेरी नदी तक विस्तृत किया ।पड़ोसी राज्यों में वारंगल का संस्थापक कायप नायक ,उसका मित्र प्रोलय वेम तथा वीर बल्लाल तृतीय उसके विरूद्ध थे। हरिहर एक योग्य शासक था।उसने अपनी बुद्धि का परिचय देकर उसने बादामी, उदयगीरी व गुट्टी के दुर्ग पर अपनी सत्ता सुदृढ़ की । बल्लाल तृतीय मथुरा को जीतने में व्यस्त था तो स्तिथि का लाभ उठाकर हरिहर ने उसकी पूर्वी सीमा पर अधिकार कर लिया ।1342 ई.में वीर वल्लाल तृतीय की मदुरा के सुल्तान ग्यासुद्दीन दमगान ने धोखे से हत्या कर दी ।इसके बाद उसका पुत्र वीर बल्लाल चतुर्थ शासक बना जो अयोग्य सिद्ध हुआ।उसकी अयोग्यता का लाभ उठा कर हरिहर ने होयसल राज्य को अपने राज्य में मिला लिया।हरिहर प्रथम के समय में बहमनी और विजय नगर के मध्य संघर्ष प्रारंभ हुआ।बहमनी वंश के संस्थापक अलाउद्दीन हशन शाह ने कृष्णा व तुंगभद्रा  नदियों के मध्य स्थित रायचूर के किले पर अधिकार कर लिया ।यह बहमनी और विजयनगर के मध्य संघर्ष का प्रारम्भ था जो लगभग दो सौ वर्षों तक चलता रहा है।हरिहर प्रथम ने प्रशासनिक व्यवस्था में भी सुधार का प्रयास किया ।उसने काकतीय राजव्यवस्था का अनुकरण कर अपने राज्य को देश ,स्थल तथा नंडुओं में विभाजित किया ।शासन में कार्यों के लिए कर्नमों के रूप में ब्रह्मण की नियुक्ति की ।उसने राज्य में कृषि के विकास के लिए भी कार्य किया ।1336 ई.में हरिहर प्रथम की मृत्यु हो गई
बुक्का प्रथम(1356- 77 ई .)
उपाधि-वेदमार्ग प्रतिष्ठापक। हरिहर के बाद उसका भाई बुक्का प्रथम शासक बना ।वह एक महान योद्धा ,राजनीतिक व विद्या प्रेमी था उसने तमिल नाडु राज्य को विजय नगर में सामिल किया तथा वारंगल के राजा से समझौता कर बहमनी शासक मुहम्मद शाह प्रथम पर दबाव डाला और उससे कृष्णा -तुंगभद्रा के दोआब की मांग की।रायचूर दोआब में स्थित मुगदल के किले को लेकर दोनों के बीच युद्ध हुआ जिसमें दोनों पक्षों की तरफ से बारूद का प्रयोग किया ।यह दक्षिण में बारूद के प्रयोग का पहला उदाहरण है। बुक्का प्रथम की सबसे बड़ी जीत मदुरा विजय थी।जिसकी वजह से उसका राज्य दक्षिण में रामेश्वर तक पहुंचा। मदुरा विजय के लिए उसने अपने पुत्र कम्पन को भेजा था। मदुरा विज के बाद बुक्का ने अपने पुत्र कम्पन को नव विजित तमिल प्रदेशों पर विजय नगर का वायसराय नियुक्ति किया।कम्पन की पत्नी गंगा देवी ने अपने पति के विजय का अपने ग्रंथ मदुरा विजयम में बड़ा सजीव  वर्णन किया है। बुक्का प्रथम ने वेदों के भाष्यकार सायनाचार को प्रश्रय दिया ।1377 ई.में बुक्का प्रथम की मृत्यु हो गई। 


हरिहर द्वितीय (1377 - 1404 ई.)

उपाधि- राजाधिराज, राजपरमेश्वर, महाराजाधिराज, राजव्यास या राजवाल्मीकि।


बुक्का प्रथम के  मृत्यु के बाद हरिहर द्वितीय गद्दी पर बैठा। वह विजयनगर साम्राज्य का पहला शासक था जिसने राजाधिराज और राजपरमेश्वर की उपाधि धारण की। सम्पूर्ण सुदूर दक्षिण भारत पर विजय नगर साम्राज्य का विस्तार करने का श्रेय हरिहर द्वितीय को दिया जा सकता है। ऐसा माना जाता है की हरिहर द्वितीय श्रीलंका पर भी विजय प्राप्त की थी। तथा वहाँ के राजा से राजस्व वसूल किया। हरिहर द्वितीय विरुपाक्ष का उपासक था किन्तु शैव, वैष्णव व जैनियों को भी समान रूप से सरंक्षण दिया। विद्वानों को सरंक्षण देने के कारण उसे राजव्यास या राजवाल्मीकि की उपाधि प्राप्त थी। वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार (टिप्पणी कारक) सायणायाचार्य उसका  मुख्यमंत्री था। जैन धर्म का अनुयायी तथा नानार्थ रत्नमाला का लेखक ईरुगापा उसका सेनापति था। 1404 ई. में हरिहर द्वितीय की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में सत्ता के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया अंत में देवराय प्रथम शासक बना।  

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